Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 12 June 2015

बुला तो सकती हो ?

Some 75 years ago , poet Prahlad Parekh wrote :

આજ મારું મન પાગલ થાયે રે
શ્યામલ સજલ વાદળ  જોઈ
આભે ધાયે ,

દૂરના કોઈ  ડુંગર ભીંજે 
ખેતર ને વન ન્હાયે 
રંગ થકી જે મેઘ રંગાયે 
રંગ ધરે તે કાયે ,

શ્યામલ સજલ વાદળ જોઈ 
આભે ધાયે  





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Here is my free translation :


आभमे 
काले घने बादल देखके 
मन मेरा 
उड़ना चाहे ,


पहेले 
श्यामल रंग से 
मेघ रंगा 

तब  जाके  इसने  
खेतों और पर्बतों से 
जैसे की 
होली खेला  !

क्यूं न मेरा मन 
उड़ना चाहे  ?

क्यूं न बादलों को 
छूना चाहे  
जहां तुम बसती हो  ?

और 
मुज़े तरसती हो  !


तुम ना आ पाओगी 
ज़मीं पर 
समज़ता हूँ 

पर तुम ,
बादलो की तराह 
गरज गरज के 
बुला तो सकती हो  ?

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13  June  2015

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03 Jan  2016

And here is Google's Transliteration ( Hindi ):

आज मेरे मन पागल रे Thaye
श्यामल sajala देख बादल
, Dhaye Abhe

कोई दूर पहाड़ी bhinje
एक खेत nhaye
बादल rangaye में रंग
यह रंग काए किया जाता है

श्यामल sajala देख बादल

Abhe dhaye

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And in English :

Today my mind mad Ray thaye
Shyamal sajala looking cloud
Abhe dhaye,

No distant hill bhinje
One farm nhaye
Color in the Cloud rangaye
It carries color Kaye,

Shyamal sajala looking cloud

Abhe dhaye

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